Saturday, October 24, 2020

Dr.K.N.Udupa

 Surfing through the Net the other day I chanced upon a singer bearing the surname Udupa and the surname sounding quite familiar ,   my memory at  once flashed back to the days when decades back my father made a mention of one Dr. Udupa, who had operated upon him for duodenal ULCER in 1956 or perhaps 1957 at Snowdon Hospital,Shimla ,as being a toddler then , I didn't even know about some such thing occurring.  My father always  remembered him with respect as his saviour and life giver as surgery of that kind was not common those days.Moreover Dr.Udupa was an Ayurvedic Doctor. 

My father also remembered that he had gone to Benares afterwards.

 Padmashri Dr. K.N.Udupa  ( 28th July 1920 - 22nd July  1992 ) was born at Udupi in Karnataka in a renowned family of Sanskrit  scholars. He was educated and trained abroad also and was an FRCS. He started his career from Mandi in Himachal Pradesh and was  later posted at Snowdon Hospital Shimla.In between he had worked at Boston also. 

At Benares ,he was posted as Professor of Surgery in Ayurvedic College of BHU, which later became an Institute under his stewardship. In the ' 50s he had also headed a Committe on the Reform of Education,Practice and Research in Indigenous Systems of Medicine , which came to be known as Udupa Committee.

Dr. Udupa was awarded Padmashri in 1972. After retirement in 1980, he rendered services as a Professor Emeritus.

He died on 22nd July 1992 of Colon cancer.

I bow  in reverence to the outstanding Doctor !!

Tuesday, October 13, 2020

किशोर कुमार

 बहुमुखी प्रतिभा के धनी  अभिनेता, पार्श्व गायक, स्टेज आर्टिस्ट, फिल्म निर्माता, निर्देशक किशोर कुमार की आज पुण्यतिथि है । आभास कुमार गांगुली नाम से , खण्डवा , मध्य प्रदेश में एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में जन्मे किशोर कुमार का फ़िल्मी सफ़र तीन दशक का रहा जिसमें  उनने अभिनय भी किया और गीत भी गाए । स्टेज कार्यक्रमों  के साथ साथ फिल्म निर्देशन और निर्माण में भी सक्रिय रहे ।

फिल्म मुनीम के लिए  गाए गीत के साथ उन्हें शोहरत मिली , हालांकि उस समय , मुहम्मद रफ़ी, मुकेश, तलत महमूद, मन्ना डे, महेंद्र कपूर जैसे दिग्गज गायक भी पार्श्वगायन में सक्रिय और प्रतिष्ठित थे ।

किशोर कुमार ने नयी दिल्ली, हाफ़ टिकट, गंगा की लहरें, प्यार किये जा, हम सब उस्ताद हैं, हंगामा, मनमौजी, मेम साहब, भाई भाई, नौकरी, रंगोली, दिल्ली का ठग, मि. एक्स इन बॉम्बे , आशा, चलती का नाम गाड़ी, में काम किया । चलती का नाम गाड़ी  तो स्व निर्मित फिल्म थी जिसमें अशोक कुमार, किशोर कुमार, अनूप कुमार तीनों भाई दिखायी दिए ।फिल्म हाफ़ टिकट का एक गीत  उनने स्त्री- पुरुष दोनों आवाज़ों में गाया और यह प्रयोग सफल भी रहा   

। एक गायक के रूप में किशोर कुमार के करियर को गति फिल्म आराधना के गीतों से मिली , जिसके बाद वो लोकप्रियता की सीढ़ियां  चढ़ते ही चले गए और फ़िल्मी संगीत में किशोर कुमार युग का पदार्पण हुआ ।किशोर कुमार ने आराधना, अमर प्रेम, कटी पतंग, आप की क़सम, अनुरोध , मुक़द्दर का सिकंदर, शहंशाह, मि. इंडिया, शराबी, सागर, फंटूश, नौ दो ग्यारह, शोले, खुश्बू, आंधी, जूली, मिली, परिचय, अभिमान, अंदाज़ और अन्य कई फिल्मों के लिए यादगार गीत गाये ।आशा भोसले के साथ गाये उनके गीत बहुत सफल रहे ।

हिन्दी फिल्मों के संगीत इतिहास में yodelling करने वाले पहले गायक बने ।

उन्हें आठ बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का पुरस्कार मिला ।

उल्लेखनीय है और विडम्बना भी कि उनके बड़े भाई  अभिनेता अशोक कुमार का जन्मदिन  13 अक्टूबर  को  पड़ता है । किशोर कुमार की मृत्यु के बाद अशोक   कुमार ने अपना जन्मदिन कभी नहीं मनाया ।

महान कलाकार को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि !!

अशोक कुमार

 लगभग छः दशकों  तक अपने अनूठे अभिनय कौशल के बल पर लाखों करोड़ों सिनेमा प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले दादा  मनी के नाम से विख्यात अभिनेता अशोक कुमार - वास्तविक नाम कुमुद लाल गांगुली- की आज जयंती है । उन्हें यदि हिन्दी सिनेमा का प्रथम सुपर स्टार भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी ।देविका रानी के साथ अपनी पहली फिल्म 'अछूत कन्या'  से ही अपनी प्रतिभा का लोहा  मनवाते हुए अशोक कुमार ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और एक से एक  हिट फिल्में 

हिन्दी सिनेमा को दीं ।

उनके द्वारा अभिनीत फिल्मों में जन्मभूमि, इज़्ज़त, सावित्री, वचन, कंगन, बंधन, आज़ाद, झूला, किस्मत, साजन, संग्राम, महल , समाधि, बंदिनी, परिणीता, भाई भाई , चलती का नाम गाड़ी, हावड़ा ब्रिज,आशीर्वाद, विक्टोरिया नं.203 व  इन्तक़ाम ।


पद्म भूषण एवं दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित महान अभिनेता को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि !!

Thursday, September 24, 2020

Wood Craft

 Time and again I travel back to my School days for we learnt  there much more besides the proverbial 3 Rs. We had a subject called Craft , which was basically a wood craft where we learnt the basics  . In smaller classes we were made familiar with the Fretsaw used to cut plywood with. The Fretsaw was a thin sleek U shaped instrument , of which the loose ends had knob and screw to fix the two ends of a thin delicate blade. The Fretsaw cost anything between ₹2 & ₹3.The blade would cost 5p or 10p. We were required to make cut out of pictures fixed on the plywood, which also required a technique . 2-3 blades had to be kept at a time because being delicate, they broke easily as continued running through plywood would heat them up . Sooner than later we learnt the trick. We would give the saw rest rather frequently. A 5p blade would last through 3 or even 4 medium sized cut outs.The plywood was arranged from known shopkeeper who had these as an emptied packing material. We made cut outs of the pictures of leaders and religious entities.  With a piece of wood fixed at the bottom backside, these would serve as decoration on mantelpiece or a table.

Sunday, September 13, 2020

हिन्दी दिवस

 यह पोस्ट स्कूल के मेरे हिन्दी अध्यापकों को समर्पित है ।

मेरी शिक्षा शिमला के लेडी इरविन स्कूल से आरंभ हुई जो मूल रूप से कन्या विद्यालय था और लड़के  चौथी कक्षा तक ही  मान्य थे । इन चार वर्षों  अलग अलग कक्षाओं मेँ  एक ही अध्यापिका  जिसे क्लास टीचर कहते थे,सुबह से शाम तक पूरा दिन हर विषय पढ़ाती थी । बाद मे आगे की पढ़ाई के लिए पाँचवीं कक्षा में जब एस॰ डी॰ स्कूल में प्रवेश लिया तो  पाया कि हर विषय के लिए  अलग अध्यापक  उपलब्ध है । मेरे कक्षा प्रभारी ज्ञानी बलकार सिंह थे जो पंजाबी भाषा के अध्यापक थे ।मेरे  प्रथम हिन्दी अध्यापक श्री उद्धवानंद थे जिनके मार्गदर्शन में मैंने कलम से लिखना सीखा । पाँचवीं कक्षा में मेरे प्रवेश लेने के 3-4 महीने बाद ये हिन्दी अध्यापक नौकरी छोड़ कर  अन्यत्र चले गए और अस्थायी प्रबंध के तौर पर लगभग डेढ़- दो महीने हिन्दी का पठन पाठन एक प्रयोगशाला सहायक के हवाले रहा, परिणामस्वरूप कोई पढ़ाई न हुई । इसके बाद एक युवा अध्यापक श्री चमनलाल गुप्त हिन्दी अध्यापक के रूप में आए ।थोड़े ही समय में गुप्त जी ने पढ़ाने  की अपनी नैसर्गिक प्रतिभा का परिचय दिया और पढ़ाने के अतिरिक्त वाद- विवाद व भाषण प्रतियोगिताओं के लिए  छात्रों को तैयार करने में भी भरपूर योगदान दिया । मूल रूप से हिन्दी विषय के अध्यापक होते हुए उनने हमें अंग्रेज़ी और सामाजिक अध्ययन भी कुशलता से पढ़ाए । स्कूल में पढ़ाते हुए इनने स्नातक, बी॰एड॰ और एम॰ए॰(हिन्दी) की परीक्षाएं पास की। बाद का सफर तय करते हुए विश्व विद्यालय में पढ़ाते हुए शिक्षा क्षेत्र में उपलब्धियां प्राप्त कीं  और आज भी किसी न किसी रूप में सक्रिय हैं ।

श्री भवानन्द भास्कर बड़ी कक्षाओं के हिन्दी अध्यापक थे । बहुत अच्छा पढ़ाते थे और उनका सैन्स ऑफ ह्यूमर कमाल का था । हँसाने के साथ साथ उनकी बातों में छात्रों के लिए शिक्षा के प्रति गंभीर रहने का संदेश निहित होता था और भविष्य के लिए चेतावनी भी । कक्षा में यदि कोई छात्र ध्यान नहीं देता था तो उसके लिए मूर्ख ज्ञानी जैसा सम्बोधन भी  उनके शब्दकोश में था ।

तीनों भाषाओं यथा हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी के हमें उत्कृष्ट अध्यापक मिले,परिणामस्वरूप भाषाओं में मुझे विशेष रुचि रही ।

अपने अध्यापकों के प्रति मेरा साभार नमन !!

Saturday, September 12, 2020

Shimla Musings

आज अपने स्कूल के एक अन्य अध्यापक महोदय की याद आ रही है , जिनका नाम नराता राम था । उम्र से काफी बुज़ुर्ग थे पर चुस्त दुरुस्त । संजौली में रहते थे और लक्कड़ बाजार तक आना जाना साइकिल पर  होता था । विद्यार्थियों को सख्त हिदायत थी कि ऐसे समय उन्हें अभिवादन न करें , शायद एक बार ध्यान बंटने पर दुर्घटना होते होते बची । घनी मूंछे और टोपी उनकी विशेष पहचान थी । छोटी कक्षाओं को गणित,  सामाजिक अध्ययन पढ़ाते थे। गणित के ऐसे ऐसे फार्मूले उनके पास थे जो  किताबों में कहीं ढूंढ कर नहीं मिलते थे । पढ़ाने का ढंग बहुत अच्छा था । दोनों विषयों पर पकड़ अद्भुत थी । चाहे  इतिहास  में जलालुद्दीन अकबर हो या भूगोल  में  मरुस्थल कालाहारी, विस्तृत जानकारी मिल जाती  थी ।रौब  पूरा था , अनुशासन हीनता बर्दाश्त न थी । गुस्सा आने पर 'हराम खोरो'  उनका तकिया क़लाम था । एक बार शनिवार को क्लास छोड़ते समय उनके मुंह से निकल गया 'ज़िन्दगी रही तो फिर मिलेंगे' . मेरा रविवार का दिन भी इसी पसोपेश में गुज़रा कि कहीं कुछ हो न जाए । सोमवार को जब सब सामान्य पाया तो मन को  शांति मिली ।

Tuesday, September 8, 2020

Shimla Musings

 There   have been nostalgic posts from friends on Facebook about the harsh snowy winters in Shimla with attendant hardships and the  Lion face shaped  public hydrants  that apart from being a  dependable public utility were also a marvel of technology.  This post covers both aspects.

Till   beginning of August, 1964 we lived in  a literally shady area above the circular road with only a little sunshine. As a result water pipes got frozen in winter posing great difficulty.

One such winter, the water pipe got frozen and water had to be brought from the  lion faced public hydrant below AG office which was at a walkable distance. While my father would  carry full sized two buckets in the morning and in the evening after coming from Office, we kids supplemented the effort by  volunteering to carry water in small Dalda cans and milk buckets. My elder sister ventured to carry a bucket . As we were coming back  after filling our containers, just at a place from where the descent starts, a tall sanyasi type gentleman ,perhaps in late fifties clad in white long kurta and dhoti , with  shoulder length hair smilingly took the took the bucket from my sister and carried it up to the bifurcation to the  path that lead to our residence. We could only bow in respect to him . 

Compare this in with today's pontificating , sermonizing god men  living in 7 star luxury .

The incident is etched deep in memory and is fresh  after more than  half a century .