Monday, March 19, 2018

Navin Nischol

Today is the death anniversary of  Navin  Nischol, the good looking  film and  TV actor. Born on 11 April, 1946, he received  school education  in Bangalore . Later he passed out  from   the  Film and Television Institute  of  India with a Gold Medal . Making his debut with the 1970 film Sawan Bhadon, he also starred in films like Victoria No. 203 and Dhund.  His most successful film however was, Hanste Zakhm . His filmography includes films likeParwana, Nadaan, Sansaar,  Ganga Tera Pani Amrit, Budha Mil Gaya , Dharma, Main Wo Nahin, Mere Sajna, Ek Se Barh Kar Ek ,Do ladke Dono Kadke,The Burning Train, Desh premi , Raju  Ban Gaya Gentleman, Lahoo ke Do Rang, Aakrosh, Mahaul Theek Hai, Hindustan Ki Kasam, Aashiq  Banaya Aap Ne , Khosla Ka Ghosla, and many many others.
His most successful TV serial was Dekh Bhai Dekh.
His  Punjabi   films  were Aasra Pyaar Da  & Mahaul Theek Hai.
He died this day in 2011 aged 64.
  • Our humble tributes !

Sunday, March 18, 2018

Eknath D Solkar

Today is the  70th birth anniversary of Eknath D. Solkar, the Indian Cricket all-rounder. A left hand batsman and a left arm bowler, he was also a wicket keeper for team India. Acknowledged as the best short forward leg fielder, the catches taken by him  resulted in the first Test win against England at Oval.
He played in all formats of the game  viz Test, First Class and  ODI. He also played County cricket in England.
He died in 2005 aged 57.
Our humble tributes !

Saturday, March 17, 2018

Ghulam Mohammed

Today is the 50th death anniversary of Ghulam Mohammed,the highly talented composer of Hindi Cinema.He born in 1903 at Bikaner in Rajasthan. He started as a child actor in local theatre.Later turning to music, he shifted to Mumbai and initially  worked as an assistant to Naushad and Anil Biswas.His debut as an independent composer came in 1947 with the film Tiger Queen.Later he composed timeless melodies for films like Mirza Ghalib, Pakeezah , Shana, Anmol Ghadi. In fact for Mirza Ghalib, he was awarded the National Award for the Best Music Director and deservingly so because  it was no less due to his compostiion than the wonderful voices of Suraiya, Talat Mehmood and Muhammad Rafi that all the  ghazals  that figure in the movie are all time favourites .
This is equally true of Pakeezah , the songs ofwhich  ring in the ear, even today after fifty years down the line when these were recorded .The film was released in 1972, four years after  Ghulam Mohammed's death in 1968.
It is on record that the actor Pran refused to receive the award in 1972 for his role in Beimaan, as he strongly felt that Ghulam Mohammed deserved it more for the music he composed for Pakeezah.
He also composed music for films like Grihasthi,Kaajal, Shayar, Pardes,Ambar, Dil-e-Nadaan, Anmol Ghadi, Kundan, Do Gunde and Laila Majnu.
He died this day in 1968, aged 65.
Our humble tributes !

Thursday, March 15, 2018

By the way :

I  was amused to read a joke somewhere  wherein  a conversation  went on   between  a  Police Officer and his subordinate  a la  the  popular TV serial  CID- Daya , kuchh  pata  chala  ?
“Did you gather some information about the incident ?”
“Yes, Sir !   The woman shot her husband in the foot  for walking on wet floor.”
“Why didn’t you arrest her ?”
“ Sir, the floor has not dried  as yet  !”
I am more or less also sailing in the same boat except that   mercifully we do.not possess  any such weapon. The lady of the house, a cleanliness buff  or a freak  also gets angry  if  such  an incident comes to pass. I play it safe by stepping out  and having a walk outside till she  is done with all cleaning and mopping. In fact, she herself calls me out to   prepare  a second cup of morning tea for both of us.
Often she laments and complains  about  heavy  domestic  chores taking toll   in the form of tiredness. But then habits die hard. No budging from the daily routine, come what may !
A caring, dutiful, and well meaning  husband , that I can safely claim myself to be, I want to do my little bit  but  I  avoid being confronted with the verbal tirades lke   ‘ ye kya  kar diya , sarey mein pani  gira diya ….’
But  do help her in my own way  as  when she is out for a short while, in her absence  I do dishes and utensils like  kadahi, pressure cooker , plates and bowls , not leaving anything in the sink. By the time she  comes, everything  is spick &  span and   in  apple pie  order and she cannot complain  about anything.

Monday, March 12, 2018


One of the finest actors who with the passage of time was relegated to oblivion was Brij Mohan Vyas aka B.M.Vyas.Born on 22 October, 1920 at Churu,Rajasthan,he was the younger brother of Bharat Vyas, the  well known lyricist.
Also a screenwriter, he acted in or was associated with many hit films and block busters of the time like Barsaat, Akbar, Awaara, Aladin & the  Wonderful Lamp, Baiju Bawra, Rani Roopmati,   Janam Janam Ke  Phere , Do Aankhen Barah Haath, Sampooran Ramayan,Samrat Chandragupt, Kahin Din Kahin Raat, Saranga, Yeh Raat Phir Na Ayegi and many many others.
His most memorable role was  that of  Raavan that he played in Sampooran Ramayan, the ten faces of Raavan showing different expressions or mudras.
He is equally remembered for the role of  barber in Do Aankhen Barah Haath,who makes a failed attempt to  kill the Jailor (played by V.Shantaram).
Blessed with a long life he died on 11th March, 2013, aged 92.
Our humble tributes !

Thursday, March 8, 2018

शहर की शराफ़त

शहर की शराफ़त
( कहानी संग्रह )
लेखक :शेर सिंह
ISBN: 978-81-7667-347-1
भावना प्रकाशन ,
109-ए,  पटपड़ गंज , दिल्ली- 110091
पृष्ठ संख्या:144
मूल्य: रु॰ 350/-
प्रस्तुत कहानी संग्रह श्री शेर सिंह का दूसरा  कहानी संग्रह है ।इससे पूर्व उनका एक कहानी संग्रह ‘आस का पंछी’ व काव्य संग्रह ‘ मन देश है, तन प्रदेश’  प्रकाशित हो चुके हैं । उनकी कहानियाँ व कविताएं नियमित रूप से पत्र- पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होती रहती हैं ।
इस संग्रह का शीर्षक  ‘शहर की शराफ़त’ अपने आप में व्यंग्य , विद्रूपता समेटे हुए है जो लेखक के मन्तव्य  को उद्घाटित करता है। लेखक का संबंध हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िला से है । अपने गृह राज्य हिमाचल प्रदेश से कहीं अधिक इनका कार्य स्थल   बाहर के राज्यों के विभिन्न स्थानों में रहा है, जिनमें कुछ महानगर भी शामिल हैं। परिणाम स्वरूप लेखक का दृष्टिकोण व्यापक और दृष्टि पैनी है । इस संग्रह में कुल ग्यारह कहानियाँ हैं, जिनकी विषय वस्तु अलग अलग है।
शुरू की कहानी  ‘अभिशप्त’ के केंद्र में कभी दबंग रही पर अब अस्सी को पहुँच चुकी बुजुर्ग महिला देवयानी शर्मा  है । जवानी में बेमेल विवाह के चलते उसकी पति से बिलकुल नहीं पटी और अपने कर्कश स्वभाव के चलते अपनी बहुओं के भी उसका व्यवहार ठीक नहीं रहा । चार बेटों की माँ बनी पर  आधे से अधिक परिवार को गंवा चुकी देवयानी को इस अवस्था में अपने पोते की दवा- दारू व सेवा सुश्रुषा करनी पड़ रही है, जिसकी बीमारी  किसी भी श्रेणी में नहीं कही जा सकती  और अपरिभाषित है । कहानी का शीर्षक  ‘अभिशप्त’ उचित जान पड़ता है, पर इसमे नैसर्गिक न्याय की भी बात आती है । अँग्रेजी में कहें तो life has come full circle for her.

दूसरी कहानी ‘सफर में’  में रेल यात्रा के दौरान एक पूर्व मंत्री व उसके साथी सहयोगियों से मुलाकात , घटना क्रम आदि का जीवंत अनुभव दर्शाया गया है । किस प्रकार पद में न रहने की कुंठा व निराशा, चाहने वालों की भीड़ देख कर काफूर हो जाती है, देखते ही बनता है।राजनेताओं व जन प्रतिनिधियों की मनोवैज्ञानिक स्थिति का सुंदर चित्रण इस कहानी में मिलता है ।
तीसरी कहानी ‘अतृप्ति’ के केंद्र में 70-72 साल के एक सेवा निवृत्त  अधिकारी  मि. गर्ग  है जो कि भूलने की बीमारी से ग्रसित हैं । परिवार वालों ने उनकी देख भाल के लिए रानी नाम की एक युवती  रखी  है। कहानी मोड़ तब लेती है जब मि.गर्ग अपनी पोती की उम्र की उस युवती से प्यार की मांग कर बैठते हैं।कहानी में यहाँ तक पहुँचते ही ग़ालिब का शेर जेहन में आता है-“गो हाथ में जुंबिश नहीं, आँखों में तो दम है...”। निश्चित रूप से  70-72 साल के एक बुजुर्ग का यह व्यवहार अप्रत्याशित है पर इसमे केवल निवेदन भर है, ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं ।रानी इस बात का ज़िक्र मिसेज गर्ग से करती है, पर मिसेज गर्ग ज़्यादा सङ्ग्यान नहीं लेती और रानी को थोड़ा समझाने की कोशिश करती है ।पर रानी को  तब तक चैन नहीं पड़ता जब तक कि वो पड़ोसिनों पर इस बात का खुलासा नहीं करती । परिणाम स्वरूप, मि. गर्ग उपहास का पात्र बनते हैं ।मेरी दृष्टि में यह एक mitigating  circumstance  है, जो मि. गर्ग के प्रति कुछ सहानुभूति जगाती है और साथ ही घरेलू नौकरों की मानसिकता की ओर भी संकेत करती है।
‘शिकारी’ कहानी में येन केन प्रकारेण शहर में व्यवसायिक लाभ के दृष्टिगत ज़मीन हड़पने की कोशिश में रहने वाले लोगों का वर्णन है , जो इस प्रयोजन हेतु -साम दाम दंड भेद - कोई भी नीति अपनाने में नहीं चूकते ।कहानी प्रथम पुरुष में लिखी गयी है। लेखक एक ऐसे ही व्यक्ति के जाल में नहीं फँसता और अपना बचाव कर लेता है । ‘शिकारी’ सदा शिकार की तलाश में रहते हैं । मेरी राय में   poetic justice  का कुछ ध्यान रखते हुए यदि ऐसे चाल बाज़ लोगों को किसी अंजाम तक पहुंचाया जाता तो कहानी का प्रभाव कुछ अधिक हो सकता था।

‘माँ’ कहानी में लगभग अपंग हो चुकी  एक बुजुर्ग महिला का वर्णन है, जिसकी कर्तव्यपरायण एवं ममतालु पुत्री  प्रिया उसे अपने घर ले आती है   पर अपनी सास के दिन रात के  तानों  और लड़ाई झगड़े के चलते अपने आप को असहाय पाती है  और अपने भाई से माँ को ले जाने का आग्रह करने पर मजबूर हो जाती है । बुजुर्ग महिला की हालत द्रवित करती है और कहानी रिशतेदारों और बेटों की  संवेदन हीनता की ओर संकेत करती है ।
‘अजनबी हमसफर’ भी सहयात्री जोड़े  के मनोविज्ञान का अच्छा विश्लेषण करती है और उनकी जुगाड़ू प्रवृत्ति से रूबरू  करवाती है। एयर पोर्ट और विमान यात्रा का जीवंत विस्तृत विवरण अपने आप में अद्भुत है और पाठक को हवाई यात्रा का पूरा आस्वाद कराने में सक्षम है। विमान यात्रा करने वाले अथवा कर चुके  पाठक सहज ही कहानी से जुड़ाव महसूस कर सकते हैं ।‘अनुशासन का कीड़ा’ में एक खब्ती उच्चाधिकारी के मातहत कार्य कर रहे कनिष्ठ अधिकारी  के उत्पीड़न और प्रताड़णा का  अनूठा चित्रण है, जिस से जुड़ाव सहज और संभव है । हम में से अधिकतर नौकरी पेशा लोग कभी न कभी ऐसे पर पीड़क तथा  maverick  अधिकारियों के पल्ले जरूर पड़ते हैं ।

‘बड़े अधिकारी का निरीक्षण दौरा’  में मंत्रालय  से निरीक्षण पर आने वाले अधिकारी के लिए मेजबान अधिकारियों को कितना ताम झाम करना पड़ता है  और किस तरह मिजाजपुर्सी के साथ साथ नखरों को झेलना पड़ता है, इसका बहुत विस्तार और रोचक शैली में खुलासा किया गया है । तथाकथित निरीक्षण वास्तव में अधिकारी द्वारा सैर सपाटे का ही जुगाड़ लगता है । भुक्त भोगी इस कहानी से जुड़ाव महसूस कर सकते हैं ।
‘दरकते रिश्ते’ कहानी दो परिवारों के बीच आत्मीय रिश्तों से शुरू हो केआर, इनमें से एक परिवार पर, नव ब्याहता दुल्हन द्वारा उत्पीड़न  का झूठा आरोप लगाया जाना  IPC की धारा 498ए  के दुरुपयोग पर प्रकाश डालती है है , जैसा की आम देखने में आ रहा है ।
‘सुबह का उजाला’  में एक गरीब सहयात्री महिला व उसके बच्चों का बस किराया एक महिला की पहल पर अन्य यात्री जुटाते हैं , इससे  आत्मिक संतोष की जो भावना उभरती है वह   मानवता के अभी ज़िंदा होने का भी सबूत देती है ।
शीर्षक कहानी ‘शहर की शराफ़त’ बदलते समय, generation gap, की ओर संकेत करती है, जिसमें लोगों के आत्मकेन्द्रित होने के साथ साथ सम्बन्धों की ऊष्मा के लुप्तप्राय: होने की ओर संकेत है । अलबत्ता ऐसा अब केवल बड़े शहरों मे  सीमित न हो कर  अन्य स्थानों पर भी  देखने में आ रहा है ।
जाने माने कथाकार सूरज प्रकाश द्वारा दिये गए आमुख  से पूर्ण सहमति है । कहानियाँ निश्चित तौर पर ईमानदारी से लिखी गयी रचनाएं हैं , जो आस पास के परिवेश , व्यक्तियों, घटनाओं  व  अनुभवों पर आधारित हैं, जो कि अपने आप में जीवन की विसंगतियों और विद्रूपताओं को समेटे हुए हैं  कहानी संग्रह  सहज व सादा भाषा शैली में होने के कारण पठनीय  है और बहुत कुछ सोचने पर भी मजबूर करता है ।
 लेखक से भविष्य में भी बहुत कुछ की आशा की जाती है ।

Wednesday, March 7, 2018

Govind Ballabh Pant

Today is the death anniversay of Govind Ballabh Pant,one of the foremast leaders during the Indian Independence movement.
He was the second Chief Minister  of United Provinces during the pre independence period. Post independence,he served as the first Chief Minister of Uttar Pradesh. He also served as the Home Minister in Nehru's cabinet.
He died this day in 1961 aged 73.
Our humble tributes !