‘बिरह दा सुल्तान’ शिव बटालवी, पंजाबी कविता का एक अमिट हस्ताक्षर। शिव बटालवी की आज जयंती है। अपने जीवन के 37वें वर्ष में ही इस संसार को अलविदा कहने वाले इस अत्यंत लोकप्रिय कवि को सबसे कम उम्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित होने का गौरव हासिल है। अपने अल्प जीवन काल में ‘लूना‘ काव्यनाटक की रचना के साथ साथ अनेकों गीत व कविताएं भी रची। उनकी कविताओं में सौंदर्य, प्रेम , भावावेग, विरह आदि सब का समावेश मिलता है । बिरह का शिव बटालवी की कविताओं में जो बाहुल्य या आधिक्य बल्कि उसके प्रति जो जनून मिलता है, उसकी पृष्ठभूमि में अधूरे प्रेम प्रसंग हैं । हिमाचल के बैजनाथ में एक मेले में मैना नाम की एक लड़की से मिलना और फिर उसकी खोज में उसके गाँव जाना और वहाँ उस लड़की की मृत्यु का समाचार मिलना एक प्रसंग है जिसकी पीड़ा ने शायद शिव बटालवी को ताउम्र सताया होगा ।एक अन्य प्रसंग में एक अन्य लड़की जिससे उन्हें प्यार था, का विवाह और जगह हो जाना भी पीड़ा का एक कारण रहा हो सकता है । बिना आडंबर के,सीधे सादे शब्दों में गूढ़ भावों की अभिव्यक्ति शिव बटालवी को अलग पहचान ही नहीं देती बल्कि उन्हें कवियों की अग्रिम पंक्ति मे भी खड़ा करती है. ’मैनु तेरा शबाब लै बैठा.....’ और ‘चरखा मेरा रंगला विच सोने दियाँ मेखां......’ तो लोकप्रियता के शीर्ष पर हैं।उनकी कविता में क्लासिकल और रोमांटिक दोनों का समावेश और समन्वय मिलता है। यूं उनकी तुलना अंग्रेज़ रोमांटिक कवि शैले से भी की गई है परंतु शिव बटालवी, जॉन कीट्स के भी काफी निकट पाये जाते हैं। सौन्दर्य बोध , मृत्यु की ईच्छा व मृत्यु का पूर्वाभास दोनों में पाया जाता है। उल्लेखनीय है कि शिव बटालवी और कीट्स दोनों ने ही दीर्घायु नहीं पाई और युवावस्था में ही इस संसार को अलविदा कह गए .
शिव बटालवी के गीत/ कविता की एक बानगी:
“असां ते जोबण रुते मरना
टुर जाणा असां भरे भराये
एह मेरा गीत किसे न गाणा
एह मेरा गीत मैं आपे गा के
भलके ही मर जाणा.......”
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“माये नी माये
मैं इक शिकरा यार बनाया
ओदे सिर ते कलगी
ओदे पैरीं झाँझर
ते ओ चोग चुगेंदा आया......”
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“ जाच मैनु आ गयी गम खाण दी
हौली हौली रो के जी परचाण दी......”
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“जी करदा ए इस दुनिया नू मैं हस के ठोकर मार देयां......”
शब्दों के इस चितेरे को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि 🙏


